वसुधैव कुटुंबकम्: पर्यावरणीय संपोषणीयता की भारतीय अंतर्दृष्टि

Authors

  • Sarad Kumar Yadav Shaheed Bhagat Singh Evening College, University of Delhi

DOI:

https://doi.org/10.56042/bvaap.v32i1.12184

Abstract

संपूर्ण विश्वभर में मानव गतिविधियों की वजह से पारिस्थितिकीय विकृतियाँ और आपदाएँ उत्पन्न हो रही हैं। ये पर्यावरणीय विकृतियाँ प्राकृतिक संसाधनों के अति-दोहन, वनों की अंधाधुंध कटाई, और औद्योगिक प्रदूषण के रूप में सामने आ रही हैं। नतीजन, इसका न केवल पारिस्थितिकीय तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि यह कृषि-उत्पादन और जैव-विविधता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। इस स्थिति ने उन समूहों के जीवन को सबसे अधिक प्रभावित किया है जो अपनी आजीविका के लिए जल, जंगल और भूमि पर पूरी तरह निर्भर हैं। दरअसल, इसका एक प्रमुख कारण वर्तमान नव-उदारतावादी अर्थतंत्र है, जो प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्ज़े और अधिकतम उपभोग के आग्रह पर आधारित है। नव-उदारतावादी अर्थतंत्र, जो अस्सी के दशक में एक प्रमुख आर्थिक सिद्धांत के रूप में उभरा, जिसका ज़ोर बाजार की स्वतंत्रता, निजीकरण, और विनियमन के उन्मूलन पर होता है। इस तरह की प्रणाली में, आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में अत्याधिक वृद्धि और उनके अंधाधुंध दोहन पर जोर दिया जाता है, जो एक ऐसी प्रवृत्ति है जो चिंता का एक महत्वपूर्ण कारण है। ऐसे में, वर्तमान पारिस्थितिकीय संकटों से निपटने के लिए हमें ऐसी रणनीतियों पर विचार करना चाहिए जो पारस्परिकता और पारिस्थितिक संतुलन को प्राथमिकता दें। इस संदर्भ में, भारत के "वसुधैव कुटुंबकम" दर्शन पर विचार करना बेहद शिक्षाप्रद होगा।

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Published

2025-07-16

How to Cite

वसुधैव कुटुंबकम्: पर्यावरणीय संपोषणीयता की भारतीय अंतर्दृष्टि. (2025). Bharatiya Vaigyanik Evam Audyogik Anusandhan Patrika (BVAAP), 32(1), 32-36. https://doi.org/10.56042/bvaap.v32i1.12184